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युद्ध पूरे ज़ोरों पर था | अपने अपने रथ में अर्जुन और कर्ण आमने-सामने थे | द्वन्द्व इतना भीषण था कि मानो समय ठहर सा गया था, संभवतः इस युद्ध का परिणाम देखने के लिए | दोनों धनुर्धर अपनी चरम क्षमता पर थे | अर्जुन के बाण कर्ण के रथ को २०-३० कदम पीछे धकेल रहे थे | वहीँ कर्ण के बाण अर्जुन के रथ पर प्रहार कर उसे ५-६ कदम पीछे धकेल रहे थे | इस उत्तेजित वातावरण में वासुदेव श्री कृष्ण अपने रथ में उठ कर खड़े हुए और कर्ण की सराहना करने लगे | "अहो कर्ण! अहो अंगराज!" अर्जुन आश्चर्यचकित थे | "प्रभु! आप सारथी मेरे हैं, और सराहना मेरे शत्रु की कर रहे हैं ? जबकि मेरे बाण ज़्यादा प्रभावशाली हैं ! ऐसा क्यूँ , प्रभु? क्या आपको हमारी विजय पर शंका है ?" वासुदेव मुस्कुराए | "पार्थ, जब मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हारी विजय निश्चित है | जहाँ तक बाणों के प्रभाव की बात है, तो यह मत भूलो कि तुम किस से लड़ रहे हो, और वह किस से लड़ रहा है | तुम केवल कर्ण से लड़ रहे हो | धर्म तुम्हारे साथ है | कर्ण धर्म के विरुद्ध लड़ रहा है | यह जानते हुए भी कि उसकी मृत्यु और उसकी पराजय निश्चित है, वह अपने भाग्य से लड़ रहा है | वह तुम से लड़ रहा है | वह हनुमान से लड़ रहा है जो तुम्हारे ध्वज में है | वह सारे ब्रह्मांड से लड़ रहा है जो मुझ में समाया है | " "मत भूलो पार्थ, कर्ण के पास बहुत से कारण थे यह युद्ध न लड़ने के | परन्तु वह उन सब कारणों को त्याग कर एक ऐसा युद्ध लड़ रहा है जिसमे तुम्हारा रथ विजयी हो कर भी पराजित हो रहा है !" हम सब जानते हैं की उसके बाद क्या हुआ | परन्तु हम यह नहीं जानते कि हमारे अंदर कारण और कर्ण दोनो वास करते हैं | हम कारण खोजते हैं कि क्यों हम कुछ नहीं कर सकते | किन्तु वह कर्ण जो हमारे अंदर है उसे हम शांत रखते हैं |


आइये, अपने कारण त्याग दें, और अपने अंदर के कर्ण को जगाएं |

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